आज बेवजह ही नम हैं ये आंखें
शायद दिल ने चुपके से तुम्हे याद किया है!
इक दफ़ा ज़ोर से धड़का तो बहुत था,
बाहर के शोर ने इसे बेआवाज़ किया है!
वजह हो या बेवजह, तुम याद बहुत आते हो,
आंखों से सावन-भादों की बरसात करा जाते हो!
कभी वजह थे मेरे जीने की सिर्फ़ तुम
आज मगर बेवजह भी मुझे सांस दिये जाते हो!
इक दर्द की तरह रहोगे हर वक़्त तुम मेरे,
भूल जाने की वजहें तो तुम साथ लिए जाते हो,
ये साज-ये सिंगार आज सब है बेवजह,
तुम से ही था सब, जिसे 'बेवजह' किये जाते हो!!!