झमाझम बारिश बरसती ही जाती है, बादलों की गड़गड़ भी शोर मचाती है! कानों के रस्ते ये मन में उतर जाती है, धड़कन से मिलकर बस शोर मचाती है! तपती इस धरती के खौलते से सीने को; चीर कर ये बारिश बसभीतर उतर जाती है। घर के आंगन में खड़ी भीगती मैं जाती हूं, बारिश की बूंदों से सींचती मैं जाती हूं; अपने भीतर के इस बेकाबू शोर को, एकाकीपन से लड़ते अपने मन-मोर को; पुचकारती हूं उसको, दुलारती हूं उसको, कुछ धीरज और रख तू,बतलाती हूं उसको! वो समय भी आएगा,जब शोर ये बनेगा, बूंदों से मिल के सरगम,फिर गीत भी सजेगा, फिर गीत भी सजेगा, मन-मोर भी नाचेगा; तब आएगी जो बारिश, ये शोर ना रहेगा ।