मैंने तो दें दिया अपना सर्वस्व तुम्हे, तुमने क्या दिया मुझे, अंतहीन प्रतीक्षा? सुबह काम सूरज नित आता ले के नई आस, जाता हुआ चंद्रमा दें जाता फिर प्रतीक्षा! झलक सी दिखा के तुम तो लुप्त हुए जीवन से, मेरी नियति यही बस? आज भी प्रतीक्षा? दिवस-मास बीत रहे एक वचन पे तुम्हारे, हृदय करता रहता बीते पलों की समीक्षा! तुम तो हो गए हो मगन दूसरे ही जीवन में, मेरा निष्कर्ष क्या? समीक्षा और प्रतीक्षा??? -रंजना