परसों रात जाने कितने ख्वाब यूं पलते रहे, मेरा हाथ थामे तुम , साथ-साथ चलते रहे। मीठी सी मुस्कान मेरे होंठों पे जब आई थी, स्पर्श ने तेरे जगा दिया,जब आंख खुली तन्हाई थी। अच्छा होता नींद में रहती कुछ बातें तो कर लेती; सपनों में ही संग तुम्हारे कुछ हंसती कुछ रो लेती, कुछ शिकायतें करती तुमसे कुछ तुम्हारी सुन लेती, शायद ख़ुश हो जाते तुम तो कुछ बेईमानी कर लेती! चलो फिर पलकें बोझिल हैं, कुछ नींद कुछ यादों से , बंद कर के सो जाती हूं तुम फिर आ जाना ख़्वाबों में!