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तो क्या हो

शाखों से पत्तों सी ज़िन्दगी बिखर जाए तो क्या हो पेड़ यू ही कटते चले जाये तो क्या हो शहर प्रदूषण के गुप्प अंधेरो में समा जाए तो क्या हो कई बीमारीयों से जकड़ जाए तो क्या हो ज़िन्दगी से उम्मीद  जाए तो क्या हो नारी की अस्मिता सरे बाजार नीलाम हो तो जाए क्या हो हम तमाशाई बन जाए तो क्या हो हो जाये तो हो जाये हमें क्या लेना देना चाहे हमारे बुजुर्ग आश्रमों की शान बन जाये तो क्या हो बच्चे सड़को के कचरों को तलाशे तो क्या हो क्या हो जब गरीब सर्द हवा भी ना सह पाये और बेचारा तड़पते हुए सड़को पर म
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