कहते है नारी
एक अबझू पहेली-सी है
नारी को कोई समझा है
ना समझ पायेगा
ऋषि मुनि नहीं समझे
साधारण मानव कहा समझ पायेंगा
जब वो रोती है
चिल्लाती है
शिकायतें हज़ार करती है
तब हक़्क़ तुम पर
वो अपना निसार करती है
हर पल जो वो बिखरती है बाहों में अपने प्यार के
तो अपने समर्पण पर ऐतबार करती है
प्यार पर इठलाती है अपने
बात बात पर रूठ जाती है जब
चुपके से इज़हार अपने प्यार का कर जाती है तब
और चाहती बस इतना है
कि मनाओं उसे तुम
बस यही खता बार बार करती है
जब चुप वो हो जाती है
अन्दर कहीं ना कहीं बिखर जाती है
सारी उम्मीदो को छोड़
जो उसे अपने प्यार से थी
बस टूट कर
खुद में ही सिमट-सी रह जाती है
नारी को कोई समझा नहीं
वो तो एक अबूझ पहेली है
जो किसी के कहा समझ आती है
समझते समझते ही
हर बात उसकी उलझ सी जाती है