अंधेरो में छुपाई मैंने दिल की एक दुकान है, ना सिक्को से ना नोटों से, सिर्फ एहसासो से चलता ये कारोबार है,   खयालो की चाबी से जो खुले वो ऐसा एक मकान है, रात के खालीपन में बस वही तो मेरी हमराज़ है, नींद से शायद नहीं बनती उसकी कोई खास है, क्यों की  खुली आँखों से ही तो  बिकते वहां लाखो ख्वाब है   कभी सोचा की बेच दू इसका सारा सामान, क्यों ना में भी चुन लू वो नौकरी वाली राह आसान, ढलते ही शाम मैंने बदला अपना ख्याल, रास हमें ना आएगा अपने सपनो का व्यापर,   दोस्त कुछ गए मंदिर तो कुछ ने चुनी मज़ार, में तो अटका रह गया इसी चौक और बाजार, ना कमाया मैंने ज़्यादा कुछ सिर्फ थोड़ी इज़्ज़त और आदाब, ज़िन्दगी अपनी निकल गई जैसे कोई रंगीन किताब,   अंधेरो में छुपाई मैंने दिल की एक दुकान है, ना सिक्को से ना नोटों से, सिर्फ एहसासो से चलता ये कारोबार है!