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दुनिया चल रही थी ....


दुनिया चल रही थी, मैं जैसे थम सा गया।

एक मंजिल मिली मैं जैसे धागे की तरह तन सा गया,

आंखो में सपने थे, मंजिलो का जोर था,

ना जाने वो कैसा दौर था

मैं मंजिल की चाहत में सफर में खो सा गया,

थका हुआ सुरज की तरह, शाम के अंचल में सो सा गया।

चलते चलते पता नहीं कब

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