एक दिन तुमसे मिलेगा बावरा मन , आस के दीपक जलाना छोड़ना मत । क्या मिला है एक दूजे से बिछड़कर , दर्द का दामन पकड़कर जी रहे हम । हँस रहे संसार के सम्मुख निरन्तर , किन्तु भीतर आंसुओं को पी रहे हम। एक मनका प्यार का फिर कह रहा है , प्रेम का धागा कभी भी तोड़ना मत । पढ़ अगर पाते नयन के शुभ्र अक्षर , साधना यह सिद्ध हो जाती कभी की। और अर्चन की ऋचा भी अर्थ पाकर , ज़िन्दगी का सार हो पाती कभी की। फिर नयन को सूचना है इक नयन की पृष्ठ लोचन ग्रन्थ का तुम मोड़ना मत। हो गए है दूर पर इतना समय है , लौटकर फिर जी सकें जीवन पुराना। आज को इतना बुरा मत जान लेना , कल इन्हीं बातों पे होगा मुस्कुराना। वक़्त अपनी आंच में पक्का करेगा, जानकर कच्चें घड़े तुम फोड़ना मत । एक दिन तुमसे मिलेगा बावरा मन , आस के दीपक जलाना छोड़ना मत।