आज इस नए दौर के शुरुवात में, लेकर उम्मीदों के साथ में,
निकल पड़ा हुँ मैं अपने उस मंजिल के आस में।
कठिनाइयां तो हैं पर दृढनिश्चय भी कम नहीं,
महाभारत में अभिमन्यु था यो कलियुग में हम भी कम नहीं।
कर खुद से संकल्प इस रण में आया हूँ,
अभिमान नहीं माँ-बाप का आशीर्वाद संग लाया हूँ।
हार या जीत कोई नसीब की बात नहीं,
बगैर खून-पसीना यो किस्मत अभी अपने साथ नहीं।
इन्तेजार में हूँ मैं युद्ध के मैदान में,
खड़े रहूंगा डट कर अपने मंजिल के सम्मान में।
अब सिर्फ आखिरी संखनाद का इंतजार है,
अपने विजय के लिए ये कलियुग का अभिमन्यु बेकरार है।


