एक था राजा एक थी, रानी चलो सुनाऊं तुम्हें कहानी, राजा जो था बड़ा गुमानी, रानी थी परियों से सयानी, राजा था महलों का वासी, जंगल की थी रानी निवासी, राजा का हुकुम सर आंखों पर होता, मगर रानी जो थी उसकी कोई न सुनता, राजा को थी प्रजा प्यारी, रानी अपनी धुन में न्यारी, चलो सुनाऊं तुम्हें कहानी, एक था राजा एक थी रानी। एक दिन राजा यूं निकला था आखेट पर, चार सिपाही और चला घोड़े पर बैठकर, घुसकर जंगल में तीर उसने चलाया, न जाने किस ने हिरण को वहां से भगाया, चलाने की दूसरा बाण राजा ने की तैयारी, हड़बड़ाहट में खुद के घोड़े को ही तीर मारी, घोड़ा अब तो देखो पवन वेग सा दौड़ गया, राजा का दस्ता और सिपाही पीछे वह तो छोड़ गया, राजा झाड़ियों में लहूलुहान सा हो गया, गिर पड़ा पत्थर पर अब वह तो मूर्छित जो हो गया, अब होश आया राजा को न तलवार साथ ना भाला था, बस एक परी थी जिसने राजा को संभाला था, रात भर रुका राजा जंगल में, फिर सुबह लौटा अपने महल मंगल में, नींद उसे उस रात आई थी, न चैन उसे दिन में आया था, लोटा फिर वह जंगल में अकेला था, देखो जहां अब दिन ढलने वाला था, वह ढूंढ परी न मिले कहीं, और घुटनों के बल बैठ गया वही, अचानक महसूस हुआ उसे एक साया था, जो परी के पैरों की आवाज़ में समाया था, परी के पास पहुंचा और गिर पड़ा, चलाया उसने आख़िर में वह तीर परी को लग पड़ा, राजा ने अपना होश संभाला, रोया राजा ख़ूब क्या करें भला, देखो तो अब राजा अश्रुओं भरी आंखों से रो गया, परी की प्रेम पीड़ा में मौत वाली नींद वह तो सो गया। ऐसी एक कहानी थी, जो आपको सुननी थी, पारासरिया ने तुम्हें सुनाई कहानी, एक था राजा एक थी रानी।