तेवरी
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सभी पुराने बदले तौर
अब गुंडे पापी सिरमौर। कैसा दौर?
कांटों-भरी आम की डाल
दीखे अब बबूल पर बौर। कैसा दौर?
अपनेपन ने चाटी धूल
नहीं दया को कोई ठौर। कैसा दौर?
अजब अन्नदाता का रूप
जन के मुंह का छीने कौर।कैसा दौर?
जो बतलाता खुद को कर्ण
वो ही लूटे सबको और। कैसा दौर?
*रमेशराज

