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तेवरी


*तेवरी************डर फैल रहाअब चीख़-भरा स्वर फैल रहा।

सुख डूब गएबस दुःख का सागर फैल रहा।

हर फसल मरीपत्थर ही पत्थर फैल रहा।

बेगानापनअब मन के भीतर फैल रहा।

सुरसा जैसावह रूप दिखाकर फैल रहा।

क्या राजनीति!हर किस्सा बदतर फैल रहा।*रमेशराज*

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