ग़ज़ल-1
खुद झूठ कह रहा था सच्चा बयान दूंगा
देना अगर पड़ा तो हां इम्तिहान दूं गा
तू सुन नहीं सकेगा तू सह नहीं सकेगा
सच को सुबूत सच के जब दरमियान दूंगा
हक मांगती हुई चुप खामोशियां खड़ी हैं
हैं बेजुबां मैं इनको अपनी जुबान दूंगा
बाजार में खड़ा वह खुद कह रहा था खुलकर
बिकता है बेचता हूं ले लो ईमान दूंगा
इस देश के लिए चल उठ कदम बढ़ा तो
राहों में दिल बिछाकर मै पायदान दूंगा
हाथों में हाथ लेकर आंखों में आंख डाले
संग चल तेरी जमीं को मैं आसमान दूंगा
बोले 'प्रसून' मेरी सांसों में आ समा तू
चाहत का दर खुला है दिल का मकान दूंगा
रमेश प्रसून
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