ग़ज़ल-2
पहले आग लगा जाती है बस्ती में
खूब हवा फ़िर इतराती है बस्ती में
अक्सर लुट पिट जाते हैं जब लोग यहां
बात समझ में तब आती है बस्ती में
एक भरोसा बूंदों का देकर बदली
अंगारे -से बरसाती है बस्ती में
छूने को आकाश बढ़ाते वे जितनी
सीढ़ी कम पड़ती जाती है बस्ती में
चहरे चहरे बात अलग कुछ खोयी ही
बात अलग कुछ कह जाती है बस्ती में
शर्म नहीं आती क्यों उसके बेटे को
मां जब उस पर पछताती है बस्ती में
लोग 'प्रसून' ग़ज़ल के पीछे भाग रहे
वह बच कर निकली जाती है बस्ती में
रमेश प्रसून
4/75 सिविल लाइंस टेलीफोन केंद्र के पीछे बुलंदशहर 203001(उ प्र)
मोबाइल 9259269007


