जब से है उसको देखा मुझे इश्क़ हुआ लगता है
हल्की सी इक चुभन है इक दर्द मीठा सा लगता है
हर लहज़ा ज़ेहन में बस इक वो घूमता सा लगता है
ये उसकी ही धुन में ये हर दम झूमता सा लगता है
करूँ जो बंद झरोखे तो भी झाँकता सा लगता है
हर चेहरा अब मुझे बस उस ही जल्वा-गर सा लगता है
धड़कनों की ये रवानी अब और बढ़ती ही जा रही है
मुझे वो अपनी रगों में हर-सू दौड़ता सा लगता है
लगता इस दर्द की दवा उस कातिल के पास ही है
वस्ल के बिना ये मर्ज़ अब लाइलाज सा लगता है
-Rमन


