बंद पलकों में वो बस मेरा नज़र आता है
पलकें खुलते ही ये बस नज़र का धोखा है

लोग कहते हैं माहताब की ठंडक है वो
ताप आफ़ताब सा है छू के मैंने देखा है

हो के मेरा अब वो कहीं भी न जा पायेगा
क्या ख़बर थी वो जुदा होने का देखे मौका है

ढूंढ ले वो चाहे जितने भी ठीकाने अब तो
कौन होगा जिस ने दिल को मुझ सा सेका है

हो रही रूह ये नुरानी खुदा की बंदिश में
दिल से ऐसे हमने कर लिया समझौता है

-Rमन