ज़िन्दगी जीने का ही नया सलीका सिखा
बिन उसके दिखता कोई आगाज़ नहीं

फ़िज़ाओं में बिखरे हैं वो खुशबू बन कर
है कौन सी जगह जहां ये एहसास नहीं

खुद को तोड़ा उसको बनाने की ख़ातिर
हीरे के आगे कोयले की औक़ात नहीं

अब नहीं कोई डर हमें उनकी निगाहों से
इस रिश्ते में अब कोई भी मिठास नहीं

दिल जिस्म ये नयन ज़ुबां सब ही हैं बेवफ़ा
इश्क़ को तन्हाई के सिवा कुछ रास नहीं