खुद कोई करता नहीं अमल है,
सब लगे ओरों के पीछे रहते,
कसमें खाते इन धर्म ग्रंथों की,
है फिर भी सारे झूठ़ ही कहते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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लेने में सब माहिर बिलकुल,
ना कभी टका किसी को देते,
ये सब चोर चोर मौसेरे भाई,
सुनो मिल-जुल कर है रहते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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है लोक पे हावी तंत्र यहां पर
हम तो चुपचाप है सहते रहते,
सन 47 से इस टुवेंटी-2 तक,
हम देखो आ गए बहते बहते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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नेता अफसर सब मजे मारते,
हम ही बस चिंता में डूबे रहते,
टूटी सड़कें और फूटी किस्मत,
है हमसे कहती देखो अब तो चेते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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मिलीभगत हर और यहां पे,
है खुल गए भ्रष्टाचार के ठ़ेके,
इक अबला की इज्जत लुटवा,
है थानों में रिश्वत तक ले लेते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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समता, क्षमता और निर्धनता,
ये कागज पर घटते बढ़ते रहते,
इतनी आजादी पाकर भी हम,
है अन्दर ही अन्दर कुढ़ते रहते,
बोलो सत्यमेव जयते रे भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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है राज यहां कानून का कहते,
सब तान के चादर सोते रहते,
कहने को तो है सब जनसेवक,
पर कुर्सी के रौब में ऐंठ़े रहते,
इन आंखो में आ गये है आंसू,
सारी ये सच्चाई कहते कहते,
बोलो सत्यमेव जयते... रे... भाई...
बोलो सत्यमेव जयते।
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रमाकांत अबोध


