गुनाहगारों को घर में कैदकर,

प्रकृति कर रही अपना उपचार I

शीतल वायु, शुद्ध सरोवर,

मानव कर रहा हाहाकार I

क्षमा प्रार्थी हम हैं तेरे, कर नव-ऊर्जा का संचारण,

स्वस्थ और प्रफुल्लित है अब सुरभित-मुखरित पर्यावरण II


 


मौलिक एवं स्वरचित

रक्षा गुप्ता