कुछ ऐसे कानाफ़ूसी कर रही है ज़िंदंगी

जैसे किसी से 

मेरी चुग़ली कर रही हो 

और मैं हर वक़्त सवालों के

चक्र में अभिमन्यु के जैसे घिरी हुई हूँ

इन सवालों की ज़िन्दगी में

मैं अपना अस्तित्व धूमिल सा 

पा रही हूँ....

क्या यही मेरी कहानी है

जो बिना किसी आवरण

वाली किताब सी है.!



~राखी लुक्कड़