हाँ हूँ मैं अद्भुत रचना से परिपूर्ण ,

असभ्य लोगों ने मुझे उजाड़ा है ,

मैं नही लेती हूँ बदला ,

प्रकृति हूँ सबको देने में विश्वास मेरा है।


अब जो त्रासदी हो रही वातावरण में ,

इनके पीछे विवेकहीन मानव हाथ तेरा है

विलासिताओं के चक्कर में ,

तूने मुझे हमेशा तिल तिल निचोड़ा है


~राखी लुक्कड़