आज फिर एक घर ने

अपनी आँखों का तारा खोया है

कुछ मनचलों की मस्ती ने 

एक घर को खूब रुलाया है


कर रही थी खुद को बुलंद

लड़ रही थी किस्मत से

पर ना लड़ सकी

इंसानी लिबाज़ में छिपे जानवरों से


आख़िर कब तक इस देश में

लोग लड़कियों को लज्जित करेंगें

क्या बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ के नारे

केवल काग़ज़ तक ही सीमित होंगे?


अब तो क़ानूनी लोगों

कुछ तो इन्साफ करो

बेटी बचाओ के नारे को

जमीनी स्तर पर लागू करो


~राखी लुक्कड़