अब मेरा मन तुम्हारी

एक आह को सुनने के

लिए बेताब हो रहा है

जैसे पानी में बर्फ पिघल

जाती है

वैसे ही मैं अपने एहसासों

को आँसुओ में पिघला देती हूँ

फिर से मैं अकेली रह जाती हूँ

ये जो मेरी आँखों की चमक

और चेहरे की चाँदनी है

उसकी एक वजह बस तुम हो

अब जब मैं तुम में खोना चाहती हूँ

तो तुम्हारी ये दूरी मुझे हताश करती है

अगर जाना ही था तो

आस क्यूँ दी

आख़िर तुमने मेरी आह

सुनी क्यूँ नही


~राखी लुक्कड़