ये दिन क्यों ढल जाते हैं, इन आंखों में 

ये फ़िज़ा क्यों बहक जाती है, इन बातों में


ये दिल क्यूं धड़कता है, इन बाहों में

ये सांस क्यूं महकती है इन राहों में


इस खार को खिला दिया, तुम ने फूलों से

दिल के आईने को दहला दिया, तुम ने होठों से


इन शाख़ों के उजाले हैं, तुम्हारी नज़रों से

इन राहों में सजदे हैं, तुम्हारी पलकों से


बरसों की दास्ताँ क़ैद है इन दिल के धागों में

हम ने सिर्फ़ कुछ लम्हों को पिरोया है यादों में


अरमानों का ज़िक्र मत करों, उनको कभी जिया नहीं

मेहरबानियों को मत भूलो, उनसे कभी कुछ छुपा नहीं


इससे आगे क्या है, इस उधेड़बुन में क्या पड़ना

समुंदर सामने है, अब किसी लहर से क्या डरना


सुबह जो किरण उतरेगी, वो तुम्हारी याद दिलाएगी

तुम दिखो न दिखो, रोशनी बाहर खींच ले जाएगी 


अंधेरे छुपे रहते हैं मन, मंदिर, मद की मझधारों में 

बिन प्रेम की लौ, जज़्बात जल जाते हैं, आशियानों में 


जब सोते सोते आवाज़ें सुनो तुम, गलियों मैं बरात बाजों की 

सुनकर सो मत जाना, ये आवाज़ें है ज़िन्दगी के दीवानों की