उठती है जो सुबह इन किनारों से, सिर्फ रोशनी का मज़हब जानती है
करोड़ों ख़्वाबों की खातिर, वो दिन से भी उजालों का हिसाब मांगती है
इन आंधियों के ग़ुबार आते जाते रहेंगे, तुम चमन के फूल बालों में सजाए रखना
अंधेरे के सिलसिले तो बने रहेंगे, तुम हाथों से चिराग़ जलाये रखना
लम्हे जुड़ जुड़ कर ये रात दिन बनते हैं, ये मोती तुम दिल के धागों में पिरो लेना
पल भर के लिए किसी की आंखें नम हो जायें, गंगाजल समझ पलकों में जगह देना
दलदल के चमकते पानी में कप्तान अकसर कश्तियां डुबोते हैं, इन डूबते हुए सायों को किनारे दिखा देना
सूरज अभी तो उठा है नींद से, इन टूटी हुई पतवारों को मक़ाम तक पहुंचा देना
जितने बाग हैं, उतने बाग़बान भी हैं यहां, ये कोई जा कर उन्हें अच्छे से समझा देना
शाख़ काटने वालों का बोलाबाल है, फिर भी फूल माथे से लगाने का ऐतबार करा देना
