आज इंसाँ की इंसाँ से कुछ ऐसी बात हो गई 

जैसे रोशनी की रोशनी से मुलाक़ात हो गई 


शाख़ों की छाँव में, काँटे भी ख़ूब महफ़ूज़ हैं यहाँ

धतूरे पनपे हैं उजालों में, आज अंधेरों में रोशन रात हो गई 


सिर पर मटमैला आसमान था, किरकिरी थी आँखों में

सूरज था बेरहम, आज उम्मीदों की बरसात हो गई 


ख़ुशबू की ख़ातिर, ख़ुद को मिटाया है यहाँ बहारों ने

जेठ, आषाढ़ जले हैं, आज सावन की शुरुआत हो गई 


ये मौसम का जुनून, ये फुहारों का पुरवाई पर यक़ीन

ये घटाओं का सिलसिला, आज ये शाम कायनात हो गई