लम्हों को माला में पिरोने चला है, कोई दीवाना फिर से
उजालों को धागों से जोड़ने चला है, कोई परवाना फिर से
पलक झपकने में युग बीत जाते हैं, उसे मालूम नहीं
अपने प्यार का इज़हार करने चला है, कोई अनजाना फिर से
पूरा संसार सेज़ सा सज गया था, पहले पल के शुरू होते ही
बारात का महूर्त मालूम करने चला है, कोई मस्ताना फिर से
पल पल में हसरतें हैं हर ज़र्रे की, पूछो इन बूँदों के क़ाफिले से
फूलों का गुलदस्ता लिए मिलने चला है, कोई बेगाना फिर से
मन में खिजा आती है पल में, मन में बहार पुकारती है पल में
सुबह की शबनम आंखों में ढूँढने चला है, कोई अफ़साना फिर से
