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डॉ॰ आम्बेडकर - समानता दिवस

मिट्टी खोदते बाज़ुओं को, खरपतवार से जूझते हाथों को, क्यों लगते थे सब दिन समान

न सावन की फुहार, न भादों का ख़ुमार, सिर्फ जेठ की आग, इसलिए थे सब दिन समान


ग़ुलामी की बेड़ियाँ महफ़ूज़ थीं छुआ छूत की तंग गलियों में,जाति में बंटे अंधे मोहल्लों में

आम्बेडकर ने आँखें खोली थी इस दलदल में, सत्याग्रह की रोशनी भी दूर न पहुँच पाई पुराने अंधेरों में


न सड़क, न गाँव, न मंदिर, न कुआँ, न स्कूल, कुछ न था यहाँ अपना

इतना बड़ा देश, इतनी छोटी सोच, बिन बराबरी के आज़ादी थी महज़ इक सपना


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