हम पार्कों में घूमते हैं, हम सड़कों पर झूमते हैं
जब बयार उठती है, हम बेबस पलकें मूँदते हैं
सुबह होती है, तो हम शाम का इंतज़ार करते हैं
शाम होती है, तो यादों के सैलाब का आग़ाज़ करते हें
चुपके चुपके हम किताबों के पन्ने पलटते हैं अकेले में
डर है रात कहीं थक कर सो न जाये किसी सफ़े में
जिनकी राहें बिखर गईं, वो भी अरमां सजाए हैं इस मेले में
कहां है घर, कहां हैं नौकरी, कहां है मंजिल, इनके हिस्से में
जाम हमारे हाथों से छूटता नही, जब होश खो देता है चमन
बराबर शीशे में खुद को देखते हैं, बेहोश हो चाहें सारा वतन
सच्चा प्याला उठाते हैं हर रोज़, परब्रह्म की करते हैं इबादत
इंसानियत का जल है आँखों में, रोशनी की करते हैं हिफ़ाज़त
जो व्हाट्सएप का ज़हर सुबह उठकर दोहराते हैं, वो बुजुर्ग नही बूढ़े हैं
जो परिवार में अपने पड़ोसियों को शुमार नहीं करते हैं, वो बुजुर्ग नही बूढ़े हैं
जो जाने से पहले नए सायेदार पेड़ नहीं लगाते, वो बुजुर्ग नही बूढ़े हैं
जो सच्ची मोहब्बत की किताब नहीं पढ़ते, वो बुजुर्ग नही बूढ़े हैं
वो हैं बुजुर्ग, जो आज भी सूरज को सलाम करते हैं
वो हैं बुजुर्ग, जो झूठे वादे, झूठे इरादों को दरकिनार करते हैं
वो हैं बुजुर्ग, जो हर फूल की ख़ुशबू का ऐतबार करते हैं
वो हैं बुजुर्ग, जो आने वाली रोशनी का इस्तक़बाल करते हैं
