फूल सा मुखड़ा दिखा कर वादियो में खो गये

हम रसिक से बाबरे से आशिक़ाना हो गये


याद आए है सुहानी शाम औ' वो रात दिन

बन के इक झौंका हसीं जो दूर मुझसे हो गये


राह चलने की ही थी औ' दूर तक चलते रहे

और मंज़र जो हसीं थे रास्तों में खो गये


हर अदा में मस्तियां, पुरनूर सी थीं शोख़ियां

औ' निगाहों की बहारों के नज़ारे हो गये


प्यार की माला लिए सिमरन सदा करते रहे

देखते ही देखते दरवेश से हम हो गये


© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'