तितली नुमा थी ज़िंदगी उड़ती चली गई।
मन में पराग फूल के भरती चली गई।
नदिया की हलचलें कहीं, कहीं चांदनी खिली,
इक शबनमी आग़ोश में पलती चली गई।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


तितली नुमा थी ज़िंदगी उड़ती चली गई।
मन में पराग फूल के भरती चली गई।
नदिया की हलचलें कहीं, कहीं चांदनी खिली,
इक शबनमी आग़ोश में पलती चली गई।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'