जो अपने थे आज बने बेगानों से

ठेस लगी है यूं दिल को यारानों से


झूम उठी है महफ़िल जिनकी आमद से  

बैठे हैं वो बने हुए अन्जानों से


प्यार बदौलत इनकी ही तो ज़िंदा है

लगते हैं जो लोग हमें दीवानों से


ख़्वाब हुये वो दिन वो रातें प्यार भरी

जीवन के वो दिन है अब अफ़्सानों से


ख़ौफ़ भला क्या मौत का हम दीवानों को

सीखा हमने जल जाना परवानों से


तौङ दिया दिल, मंझधारों में छोङ दिया

फिरते हैं अब यहां वहां दीवानों से


बगिया को बर्बाद करें आतंकी यह

बचना होगा चमन के इन शैतानों से


© राकेश मल्होत्रा'नुदरत'