ठंडी चले समीर, धरा पर पेड़ लगाएं।
पंछी भी हर रोज़, पेड़ पर आएं जाएं।
हरियाली हर ओर, फिज़ा को महकाएगी।
होंगे जंगल पेड़, धरा भी खिल जाएगी।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत रहे


ठंडी चले समीर, धरा पर पेड़ लगाएं।
पंछी भी हर रोज़, पेड़ पर आएं जाएं।
हरियाली हर ओर, फिज़ा को महकाएगी।
होंगे जंगल पेड़, धरा भी खिल जाएगी।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत रहे