आय नहीं हैं साजना, सूरज डूबा जाय।
फूलों का श्रृंगार भी, तन पर नहीं सुहाय।।
बिंदिया, कंगना, पायलें, गुलुबंद सुंदर हार।
परिचायक सौंदर्य का, गोरी का श्रृंगार।।
ख़ुसरो, ग़ालिब मीर से, इश्क़, महब्बत, प्यार।
तुलसीदास, कबीर से, भक्ति का संचार।।
कुशा बिछाई सो गए, साधू संत फ़क़ीर।
रेशम की की भी सेज पर, व्याकुल रहे अमीर।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


