संकट की यह घड़ी है, दाता कृपा करे

मुर्झा रहा है गुलशन, खिलता हुआ करे


यह कैसी कशमकश है, उल्झन में सारा आलम

वो सब जहां का मालिक, सबका भला करे


सहमा हुआ है बचपन यौवन उदास सा है

मानव के इस चमन की रक्षा ख़ुदा करे


सुंदर बना के रखना अपने तु इस जहां को

मानव के अवगुणों को तू ही क्षमा करे


आरोग्य जग हो सारा हों खुशनुमा हवाएं

हर एक घर में सुख हो 'नुदरत' दुआ करे


© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'