करिश्मा कोई जैसे के सामने हो

वो जायें जिधर सब उधर देखते हैं 


कई रास्तों से ये हो कर है गुज़रे

कि जीवन का लंबा सफ़र देखते हैं


उसी की ही रचना के हैं सब मनाज़िर

खिले फूल पत्ते जिधर देखते हैं


चले आओ जीवन की अंतिम घड़ी है

तुम्हें देखते हैं जिधर देखते हैं


© राकेश मल्होत्रा'नुदरत'