लायेगी सुख हज़ारों फिर भोर आएगी

यह रात घुप घनेरी भी गुज़र जाएगी


सूनी हैं ग़मज़दा हैं ये उदास डालियां

इक दिन इन्हीं पे झूमती बहार आएगी


दुविधा है चली जाएगी आगे क़दम बढ़ा

कुछ और चल के देखना मंज़िल भी आएगी


तूफ़ान चलें आंधिआं भी खूब आए हैं

मुश्किल हरिक को चीरती बहार आएगी


यह रात यह अंधेरे रहते नहीं सदा

इक दिन हसीन चांदनी भी लहलहाएगी


© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'