'नुदरत' ये आशिक़ी भी अजब काम कर गई

दिल प्यार की बहार के फूलों से भर गई


देखा है इस तरह से भी जोबन बहार का  

मुटियार बन संवर के ज्यूं पी के नगर गई


रस्ते बदल बदल के भी पहुंचे उसी जगह

हर ओर से वहीं को हमारी डगर गई


चाहा था दिल की बात है दिल में छुपी रहे

फिर भी ये दिल की बात ग़ज़ल में बिखर गई


कितने हसीन पल थे वो उनसे विसाल के

वो नाज़नीन दिलनशीं जादू सा कर

गई


आई तो थी बहार जवानी की चार दिन

गुंचे महब्बतों के खिला कर गुज़र गई


© राकेश मल्होत्रा'नुदरत'