चश्में झरने हैं बहें, सुंदर लगें पहाड़।
करें सुसज्जित यह धरा, सावन अरु आषाढ़।
सावन अरु आषाढ़, दिलों में प्रीत जगाएं।
रिमझिम पड़े फुहार, फूल बगिया महकाएं।
'नुदरत' ओतप्रोत हुआ, गाए हैं नग़में।
नदिया बहती जाय, कहीं पर फूटें चश्में।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


