बेकारी औ' भूख से, व्याकुल है मजदूर।
बिपदा में सरकार भी, लागे है मजबूर।।
कैसी आंधी है चली, फैला दुःख औ' सोग।
लगा रुलाने विश्व को, कोरोना का रोग।।
दुःख, विपदा, संताप के, सारे ज़ख़्म भरे।
जग का पालन हार ही, हम पर मेहर करे।।
जैविक वायरस हैं बनें! कैसा है यह काल।
हथियारों की दौड़ में, विश्व हुआ बदहाल।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


