दोहे
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कुशा बिछाई सो गए, साधु संत फ़क़ीर।
रेशम की भी सेज पर, व्याकुल रहे अमीर।।
बजे बांसुरी शाम की, यहीं हैं तीर्थ धाम।
गोरी तोरे नयन में, बसे अवध की शाम।।
साजन को परदेस में, कहना मन की पीर।
ए बदरा आकाश के, नहीं रहा अब धीर।।
यौवन का मौसम गया, खोया सारा नूर।
सूखे पत्ते की तरह, गिरे पेड़ से दूर।।
बगिया के इक छोर में, सुंदर खिला गुलाब।
ख़त का मेरे आज तो, शायद आए जवाब।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


