दोहे

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नभ में बदरा थे घने, नाच रहा था मोर।

उस सुब्हा उस घाट पे, बंधी प्रीत की डोर।।


गोरी आई घाट पर, उङे हैं रंग हज़ार।

खिली भोर की लालिमा, ठंडी चली बयार।।


मय्या के संग डोलती, गुड़िया चलती जाए।

फूल सुहाना यह खिला, सब जग को महकाए।।


छाई होली की छटा, फूल खिले चहुं ओर।

सजी रंगों से है धरा, केसरिया है भोर।।


© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'