भरी इत्र से वाटिका, आइ वसंत बहार।
लगे फूल हैं झूमने, ठंडी चली बयार।।
सजन गये परदेस में, मनवा है घबराय।
कंगना पायल री सखी, कुछ भी नहीं सुहाय।।
फूलों की सी है खिलूं, इक भौंरे से प्रीत।
मन, चितवन में हैं बसे, मितवा मेरे मीत।।
धरती पर होने लगी, पत्तों की झंकार।
पतझड़ के आगमन से, अंकुरित हुई बहार।।
© राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'


