वो शायद इश्क़ था जो शिद्दत से किया गया था...
ये शायद प्रेम है जो धीरे धीरे बढ़ रहा है।
वो शायद इश्क़ था जो आसानी से भुला दिया गया...
ये शायद प्रेम है जो पल-पल को सहेजे हुए है।
वो शायद इश्क़ था जो हक़ जताया करता था...
ये शायद प्रेम है जो सब न्यौछावर कर आया है।
वो शायद इश्क़ था जो सब पहलू में रखना चाहता था...
ये शायद प्रेम है जो समर्पण करता जा रहा है।
वो शायद इश्क़ था जो शिक़वा किया करता था...
ये शायद प्रेम है कि कोई शिकायत नहीं।
वो शायद इश्क़ था जो वफ़ा की दुहाई दिया करता था...
ये शायद प्रेम है जो विश्वास को जिए जा रहा है।
~ राकेश ठाकुर


