आईने को रिश्वत देंगे हम किसी रोज

क़ैद कर लाए अक़्स तुम्हारा किसी रोज


मख़मली हँसी छन के आती है दूर से

पास बैठो, क़रीब से देखें तुम्हें किसी रोज


बदन लहरा कर जो हमें बहकाती हो

पकड़ लेंगे दुप्पटा तुम्हारा किसी रोज


तुम्हें देखकर यूँ ही कुछ लिख देते हैं

डर है कोई शायर न कह दे किसी रोज