मेहबूब के सीने पर इक छोटा तिल काला है

लड़खड़ाते हैं ख़ुद, मुश्क़िल से ईमाँ संभाला है


अभी कहाँ फ़ुरसत कि तुझसे बातें करें हम

मसअला ये, कि सिर्फ़ बात कौन करने वाला है


नसीहतों को हमारी ताक़ पर रखता गया है

लगता है, रंगरेज ने फ़क़त ग़ुलाबी रंग डाला है


~राकेश ठाकुर