दोपहर का धूप सबसे सच्चा है..

कभी कोई झूठी दिलासा नहीं देता

सबकुछ तपा देता है, दाह देता है

किसी से कोई भेदभाव नहीं।


पर सच्चाई जैसे कड़वी होती है

और..

बनावटी चीज़ मोहित करती हैं।

दोपहर के सच्चे धूप से सब जलते हैं

सब को शाम का झूठा छाँव पसंद है।


~राकेश ठाकुर