तुम आई
तो लगा जैसे
सिर्फ मौसम ही नहीं बदला,
मेरे भीतर का आकाश भी
नई रोशनी से भर गया।
पहले दिन बस गुजरते थे,
अब हर सुबह का दरवाजा
तुम्हारे ख़्याल से खुलता है
और हर शाम
तुम्हारे नाम पर ठहर जाती है।
तुम्हारे साथ चलते हुए
रास्तों की दूरी नहीं गिनता,
मैं बस यह सोचता हूँ
अगर सफ़र यही है
तो मंज़िल की ज़रूरत ही क्या है।
राजेश कुमार

