प्यार करने का जुर्म किया है मैंने,


अब दिल टूटने की सज़ा चाहिए ।


यह ज़िंदगी जी ली है ख़ूब मैंने,


अब मौत आए ऐसी दुआ चाहिए ।



चौंधिया गई है आँखें इस रौशनी में,


अब रात हो तो कुछ सुकून मिले ।


लगता है नये ज़ख़्मों का दौर बीत चुका है,


अब पुराने दर्द उठे ऐसी दवा चाहिए ।



यक़ीं नहीं तेरा ग़म मुझे अब भी है ,


कि अपने रोने पे अब आती है हँसी ।


हर जोड़ तो बन्धनों का खुल चुका है,


अब किस चिराग़ को आँधी से वफ़ा चाहिए ।



ये यादें बड़ी ज़ालिम है जाती ही नहीं,


कि क़ब्र खोदूँ और दफ़ना दूँ इन्हें यहीं ।


जमा हो गये हैं कई दर्द इस सीने में,


अब तो ख़ुद के लुटने का मज़ा चाहिए ।



हर शाम की तरह यह शाम भी उदास है,


अब कौन मनाये इस नासमझ रूठे को ।


बढ़ते हैं क़दम कि ख़त्म कर दूँ मैं सब कुछ,


पर इस बार भी मुझे तेरी रजा चाहिए ।